महात्मा गांधी की आत्मकथा – Autobiography of Mahatma Gandhi in Hindi

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम जो लगभग 200 वर्षों तक फैला रहा, महात्मा गांधी ने भारत और विश्व को कई प्रसिद्ध आध्यात्मिक और राजनीतिक नेताओं को दिया, जिन्होंने हमारे देश के वर्तमान परिदृश्य को परिभाषित किया और हमें सबक दिया, जो आज भी फलदायी हैं।

महात्मा गांधी की आत्मकथा - Autobiography of Mahatma Gandhi in Hindi

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में सबसे बड़ा नाम एक संत, एक वकील, एक आध्यात्मिक व्यक्ति और हमारे राष्ट्र के पिता यानी महात्मा गांधी का था।

महात्मा गांधी की आत्मकथा – Autobiography of Mahatma Gandhi in Hindi

मोहनदास करमचंद गांधी का जन्म 2 अक्टूबर, 1869 को पोरबंदर, भारत में हुआ था। उनके पिता का नाम करमचंद गांधी और माता का नाम पुतलीबाई था। उनके पिता दीवान या पश्चिमी ब्रिटिश भारत (अब गुजरात राज्य) में एक छोटी रियासत की राजधानी पोरबंदर के मुख्यमंत्री थे।

महात्मा गांधी अपने पिता की चौथी पत्नी पुतलीबाई के बेटे थे, जो एक संपन्न वैष्णव परिवार से ताल्लुक रखती थी, जिसका मतलब था कि उनकी परवरिश जैन सहिष्णुता के साथ आपसी सहिष्णुता, जीवों के प्रति चोट और शाकाहार की शिक्षाओं से प्रभावित थी।

जैसा कि गांधीजी एक विशेषाधिकार प्राप्त परिवार से थे, इसलिए उन्हें शुरुआती दिनों में भी अच्छे स्कूलों में भर्ती कराया गया था, लेकिन वे एक औसत दर्जे के छात्र थे। मई 1883 में, 13 साल की उम्र में उनकी शादी कस्तूरबा बाई से हुई थी।

उच्च शिक्षा के लिए उन्हें संबलदास कॉलेज भेजा गया, जो बंबई विश्वविद्यालय का एक हिस्सा था, क्योंकि उनका परिवार चाहता था कि वे एक वकील बनें।

उन्हें विदेश में उच्च अध्ययन के लिए जाने का अवसर मिला, उन्होंने इसे खुशी से स्वीकार किया और यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन में प्रवेश लिया। लेकिन विदेश जाने से पहले उन्हें अपनी माँ और पत्नी को समझाना पड़ा, कि वह शराब, माँस और अन्य महिलाओं से दूर रहेंगे।

London में, उन्होंने एक शाकाहारी सोसाइटी में भी भाग लिया और अपने कुछ शाकाहारी दोस्तों द्वारा भगवद गीता से परिचय कराया गया। बाद में, भगवद गीता ने उनके विचारों पर प्रभाव डाला और उनके जीवन को प्रभावित किया।

महात्मा गांधी अपने जीवन में एक नेता बने

पढ़ाई पूरी करने के बाद, वह एक वकील के रूप में काम करने के लिए 1893 में दक्षिण अफ्रीका गए। वहां उन्हें पहले नस्लीय भेदभाव का सामना करना पड़ा, जब वह ट्रेन में प्रथम श्रेणी की बोगी में प्रवेश करने की कोशिश कर रहे थे, तो उन्हें प्रवेश से वंचित कर दिया गया। इस घटना ने उन्हें झकझोर दिया और यह एक नेता के लिए एक प्रज्वलन था।

उन्होंने एक राजनीतिक आंदोलन की स्थापना की, जिसे नटाल इंडियन कांग्रेस के नाम से जाना जाता है, और अहिंसक नागरिक विरोध में अपने सैद्धांतिक विश्वास को एक ठोस राजनीतिक रुख में विकसित किया, जब उन्होंने दक्षिण अफ्रीका के भीतर सभी भारतीयों के लिए पंजीकरण शुरू करने का विरोध किया, और यह पहला असहयोग था

वह सत्याग्रह के विचार से प्रभावित थे जो सत्य की भक्ति है और 1906 में अहिंसक विरोध को लागू किया। वह 1915 में दक्षिण अफ्रीका और अपने जीवन के 21 साल बिताने के बाद भारत लौट आए, वहां उन्होंने नागरिक अधिकारों के लिए लड़ाई लड़ी और इस समय वह एक नए व्यक्ति में बदल गए।

जब वह भारत लौटे, तो उन्होंने उपनिवेश की समस्याओं को देखा, जिसका सामना हर भारतीय कर रहा था। साथी भारतीयों के संकट और पीड़ा को देखते हुए उन्होंने गोपाल कृष्ण गोखले की सलाह के तहत भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में शामिल होने और भारत की आजादी के लिए लड़ने का फैसला किया।

भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में गांधीजी की भूमिका, और महात्मा का जन्म

गांधी जी की पहली बड़ी उपलब्धि 1918 में थी जब उन्होंने Bihar और Gujrat के चंपारण और खेड़ा आंदोलन का नेतृत्व किया। उन्होंने British सरकार के खिलाफ असहयोग आंदोलन, सविनय अवज्ञा आंदोलन, स्वराज और भारत-छोड़ो आंदोलन का भी नेतृत्व किया।

उन्होंने 1920 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का नेतृत्व संभाला और राष्ट्र के प्रति अहिंसा और भक्ति में विश्वास रखने के कारण साथी नेताओं द्वारा उन्हें ‘महात्मा’ नाम दिया गया।

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का संघर्ष (1916-1945)

वर्ष 1914 में गांधी South Africa से भारत वापस लौट आये। इस समय तक गांधी एक राष्ट्रवादी नेता और संयोजक के रूप में प्रतिष्ठित हो चुके थे।

वह उदारवादी कांग्रेस नेता गोपाल कृष्ण गोखले के कहने पर भारत आये थे और शुरूआती दौर में गाँधी के विचार बहुत हद तक गोखले के विचारों से प्रभावित थे। प्रारंभ में गाँधी ने देश के विभिन्न भागों का दौरा किया और राजनैतिक, आर्थिक और सामाजिक मुद्दों को समझने की कोशिश की।

चम्पारण और खेड़ा सत्याग्रह

महात्मा गांधी द्वारा बिहार और गुजरात में कई आंदोलन चलाए गए बिहार के चंपारण और गुजरात के खेड़ा में हुए। आंदोलन को महात्मा गांधी ने अपनी पहली राजनीतिक सफलता दिलाई चंपारण में ब्रिटिश सरकार द्वारा किसानों से मजबूरन नील की खेती करवाई जाती थी और सस्ते मूल्य में खरीद कर किसानों को कम दाम दे रहे थे। ऐसे में किसान और अधिक गरीब होते जा रहे थे।

किसानों को कर्ज देकर और अधिक कमजोर करते जा रहे थे। दिन प्रतिदिन किसानों का बोझ बढ़ता जा रहा था। महात्मा गांधी के इस आंदोलन के पश्चात नील की खेती बंद हो गई।

सन 1918 में गुजरात में स्थित खेड़ा में बाढ़ और अकाल की वजह से किसानों और गरीबों की स्थिति काफी ज्यादा खराब हो गई। यहां के लोग ब्रिटिश सरकार से कर माफ करने की मांग करने लगे। लेकिन ब्रिटिश सरकार के नाम आने के पश्चात महात्मा गांधी तथा सरदार वल्लभ भाई पटेल के साथ इस समस्या को लेकर विचार विमर्श हुआ।

उसके बाद अंग्रेजों के राजस्व संग्रहण से मुक्ति देकर सभी कैदियों को महात्मा गांधी ने मुक्त करवा लिया। यह दोनों उचित काम करने के पश्चात महात्मा गांधी का यह आंदोलन चंपारण और खेड़ा सत्याग्रह के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

असहयोग आन्दोलन

महात्मा गांधी जी ने भारत में अंग्रेजी हुकूमत को भारतीयों के संभव से हटाने के लिए असहयोग आंदोलन चलाया था। अगर हम सब मिलकर अंग्रेजो के खिलाफ इस बात पर असहयोग करेंगे, तो निश्चित तौर पर आजादी संभव है।

महात्मा गांधी द्वारा चलाई गई इस आंदोलन के पश्चात भारतीय जनता में ज्वाला भड़क उठी थी। गांधीजी की बढ़ती लोकप्रियता मैं अपने आप को एक बड़ा नेता बना लिया था। गांधीजी अंग्रेजों के विरुद्ध सहयोग अहिंसा का शांतिपूर्ण प्रतिकार जैसे अस्त्रों का प्रयोग कर रहे थे।

लेकिन सन 1919 में हुए जलियांवाला बाग हत्याकांड के पश्चात गांधीजी की ज्वाला भड़क उठे और उन्होंने स्वदेश नीति का आह्वान करते हुए असहयोग आंदोलन को चलाया।

असहयोग आंदोलन में गांधी जी ने हाथ बनाए हुए, सूती खादी के वस्त्र पहनने शुरू किए। प्रतिदिन पुरुषों और महिलाओं को सूत काटने के लिए कहा। महात्मा गांधी द्वारा अंग्रेजों के सरकारी नौकरियां छोड़ने तथा सरकारी जगहों में लगे भारतीय लोगों को वापस बुलाने का अनुरोध किया और अंग्रेजी चीजों का बहिष्कार करते हुए इस आंदोलन को सफल बनाया।

असहयोग आंदोलन के दौरान महात्मा गांधी को पूरी तरह से सफलता हाथ लगी। महात्मा गांधी सभी वर्गों के लोगों को अंग्रेजो के खिलाफ जोश पैदा करने में सक्षम हुए। फरवरी 1922 के पश्चात चोरा चोरी कांड हो गया। इस घटना के बाद महात्मा गांधी ने अपना असहयोग आंदोलन वापस ले लिया। क्योंकि उन्हें अंग्रेजों ने गिरफ्तार कर लिया था और 6 साल की सजा सुना दी थी।

परंतु उसके पश्चात महात्मा गांधी की तबीयत खराब हो गई और तबीयत खराब होने के चलते उन्हें फरवरी 1924 में सरकार ने जेल से छोड़ दिया। हालांकि 6 साल की सजा थी। लेकिन तबीयत खराब होने की वजह से 2 साल में ही उन्हें जेल से रिहा कर दिया।

प्रथम विश्व युद्ध के बाद खिलाफत आंदोलन

गांधी ने महसूस किया कि हिंदुओं और मुसलमानों को अंग्रेजों से लड़ने के लिए एकजुट होना चाहिए और दोनों समुदायों से एकजुटता और एकता दिखाने का आग्रह किया। लेकिन जैसे ही खिलाफत आंदोलन अचानक समाप्त हुआ, उनकी सारी कोशिशें हवा में उड़ गईं।

स्वराज्य

असहयोग की अवधारणा बहुत लोकप्रिय हो गई और पूरे भारत में फैलने लगी। गांधी ने इस आंदोलन को आगे बढ़ाया और स्वराज पर ध्यान केंद्रित किया। उन्होंने लोगों से ब्रिटिश वस्तुओं का उपयोग बंद करने का आग्रह किया। उन्होंने लोगों को सरकारी रोजगार से इस्तीफा देने, ब्रिटिश संस्थानों में पढ़ाई छोड़ने और कानून अदालतों में अभ्यास करना बंद करने को कहा।

हालांकि, फरवरी 1922 में उत्तर प्रदेश के चौरी चौरा शहर में हुई हिंसक झड़प ने गांधीजी को अचानक आंदोलन को बंद करने के लिए मजबूर कर दिया। गांधी को 10 मार्च 1922 को गिरफ्तार किया गया और उन पर देशद्रोह का मुकदमा चलाया गया। उन्हें छह साल के कारावास की सजा सुनाई गई थी, लेकिन केवल दो साल जेल में सजा दी गई थी।

नमक सत्याग्रह (दांडी मार्च)

ब्रिटिशों ने नमक पर एक कर लगाया और नमक सत्याग्रह मार्च 1930 में इस कदम के विरोध के रूप में शुरू किया गया था। गांधी ने मार्च में अपने अनुयायियों के साथ दांडी मार्च की शुरुआत की, पैदल अहमदाबाद से दांडी जा रहे थे। मार्च 1931 में गांधी-इरविन संधि में विरोध सफल हुआ और परिणाम हुआ।

भारत छोड़ो आंदोलन

दूसरा विश्व युद्ध के आगे बढ़ने के साथ, महात्मा गांधी ने भारत की पूर्ण स्वतंत्रता के लिए अपना विरोध तेज कर दिया। उन्होंने अंग्रेजों से भारत छोड़ने के लिए एक संकल्प का मसौदा तैयार किया।   ‘भारत छोडो आंदोलन’ महात्मा गांधी के नेतृत्व में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस द्वारा शुरू किया गया सबसे आक्रामक आंदोलन था।

भारत की स्वतंत्रता और विभाजन

1946 में ब्रिटिश कैबिनेट मिशन द्वारा पेश किया गया स्वतंत्रता सह विभाजन प्रस्ताव कांग्रेस ने स्वीकार कर लिया था। सरदार पटेल ने गांधीजी को आश्वस्त किया कि यह गृह युद्ध से बचने का एकमात्र तरीका है और उन्होंने अनिच्छा से अपनी सहमति दी। भारत की स्वतंत्रता के बाद, गांधी ने हिंदुओं और मुसलमानों की शांति और एकता पर ध्यान केंद्रित किया।

महात्मा गांधी की हत्या

महात्मा गांधी का प्रेरक जीवन 30 जनवरी 1948 को समाप्त हुआ। जब उन्हें कट्टरपंथी, नाथूराम गोडसे ने गोली मार दी। नाथूराम एक हिंदू कट्टरपंथी था।  जिसने पाकिस्तान को विभाजन भुगतान सुनिश्चित करके भारत को कमजोर करने के लिए गांधी को जिम्मेदार ठहराया। गोडसे और उनके सह-साजिशकर्ता, नारायण आप्टे को बाद में दोषी ठहराया गया था। 15 नवंबर 1949 को उन्हें मार दिया गया।

महात्मा गांधी द्वारा लिखी गयी पुस्तकें

महात्मा गांधी ने अपने जीवन काल में कई किताबों की रचना की है। महात्मा गांधी की किताबें काफी लोकप्रिय भी हुई है। महात्मा गांधी द्वारा लिखी गई किताबें कुछ इस प्रकार है।

  • दक्षिण अफ्रीका में सत्याग्रह

महात्मा गांधी द्वारा अपने शुरुआती जीवन के दौरान “दक्षिण अफ्रीका में सत्याग्रह” किताब लिखी थी। इस किताब में महात्मा गांधी द्वारा वकालत की पढ़ाई के समय दक्षिण अफ्रीका में किए गए संघर्ष का वर्णन किया था। महात्मा गांधी ने इस किताब में अंग्रेजो के खिलाफ दक्षिण अफ्रीका में अहिंसक प्रतिरोध का एक राज खोला था।

  • हिंदी स्वराज

महात्मा गांधी द्वारा यह किताब सन 1909 में लिखी गई। जब भारत में ब्रिटिश शासन काल खत्म होने की शुरुआत में लग गया था। महात्मा गांधी द्वारा रचना की गई इस किताब में भारतीय स्वतंत्रता तथा पश्चिमी सभ्यताओं की प्रमुख तौर पर व्याख्या की गई। महात्मा जी की किताब “हिंदी स्वराज” को अंग्रेजों द्वारा भारत में प्रकाशित करने से रोक लगा दी और प्रतिबंधित कर दिया गया था।

  • मेरे सपनों का भारत

महात्मा गांधी द्वारा लिखी गई यह किताब “मेरे सपनों का भारत” काफी ज्यादा लोकप्रिय हुई। “मेरे सपनों का भारत” किताब महात्मा गांधी द्वारा सरल भाषा में भारतीय संस्कृति तथा पहलुओं और विरासत के बारे में विस्तार से वर्णन किया गया। महात्मा गांधी ने अपनी इस किताब में भारतीय संस्कृति को एक प्रेरणा का स्रोत बताया।

  • ग्राम स्वराज्य

महात्मा गांधी की यह पुस्तक “ग्राम स्वराज्य” काफी ज्यादा मशहूर किताबों में से एक मानी जाती है। महात्मा गांधी की किताब ग्राम पंचायतों के संगठन और आर्थिक स्थिति तथा राजनीतिक शक्ति को प्रेरणा देती है।

महात्मा गांधी की इस किताब में ग्राम पंचायतों को मध्य नजर रखते हुए, कई सामूहिक गतिविधियों को विस्तार से फैलाने का संदेश दिया गया। महात्मा गांधी ने इस किताब के जरिए लोगों को गांवों में उद्योग खोलने और उद्योग बढ़ाने की प्रेरणा दी।

महात्मा गांधी के अमूल्य विचार

  1. राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने अपने जीवन में कई प्रकार के अमूल्य विचार दिए जो लोगों के लिए प्रेरणा बन चुके हैं।
  2. महात्मा गांधी ने अपने जीवन में एक बात ध्यान देने को कहा कि भगवान के अलावा दुनिया में किसी से नहीं डरना है और किसी के प्रति बुरा भाव नहीं रखना है।
  3. महात्मा गांधी ने कहा कि अन्याय के सामने कभी नहीं झुकना है और सत्य को असत्य से हमेशा जीत दिलानी है। असत्य का विरोध करना है चाहे कितने भी कष्ट उठाने पड़े।
  4. महात्मा गांधी के अनुसार भूल करना पाप है परंतु उस बात को छुपाना महापाप है।
  5. भविष्य में क्या होगा इसके बारे में नहीं सोचना है वर्तमान के समय की चिंता रखनी है।
  6. अपनी मातृभाषा हिंदी को बढ़ावा देना है हिंदी के अलावा दूसरी भाषाओं को ज्यादा उपयोग नहीं करना है।
  7. व्यक्ति अपने विचारों के अनुसार खुद को बना लेता है। अगर अपने विचारों में खुद को एक महान व्यक्ति समझता है तो वह खुद महान बन सकता है।
  8. काम करने से आदमी कभी नहीं मरता है। लेकिन अनियमितता मनुष्य को मार डालती है।
  9. हम जिसकी पूजा और आराधना करते हैं उसी के समान हो सकते हैं।
  10. श्रद्धा और आत्मविश्वास रखना जरूरी होता है ईश्वर में विश्वास होना जरूरी है।
  11. कुछ लोग सफलता के केवल स्वप्न ही देखते हैं। लेकिन कई लोग इन सपनों को पूरा करने के लिए कड़ी मेहनत करते हैं और जागते हैं।
  12. सुख प्राप्त करने के लिए अहंकार को छोड़ना होगा सुख कहीं से मिलने वाला चीज नहीं है।
  13. जिंदगी में कभी हिलता नहीं करना अहिंसा ही मानवता का एक धर्म है।
  14. प्रेम दुनिया की सबसे बड़ी शक्ति है इस पर कोई भी महाशक्ति हावी नहीं हो सकती हैं।
  15. स्वयं को जानने का सबसे सर्वश्रेष्ठ तरीका यही है कि स्वयं को दूसरों की सेवा में लीन कर दें।

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